बहुत दिन गुज़र गए, जब मुझ में अखिरी बार हिन्दी में लिखने की प्रेरणा जागी थी । आज फ़िर वैसा ही अवसर आया है । आज मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी हिन्दी, मेरी मातृ भाषा, कमज़ोर हो गई है । यह ऐसे युग में हो रहा है जब हर देश अपनी ही मातृ भाषा पर ज़ोर दे रहा है । मैं हूं यहां, इस किनारे में, सिर्फ अंग्रेज़ी में लिखी जा रहा हूँ ।
आज के इस इन्टरनेट युग में, दुनिया सिमट कर रह गई है । ज्ञान का भंडार है यह ‘जाल’ !! पर हिन्दी भाषा में लिखित बहुत कम चीज़ें हैं । एक तरफ़ चीनी, जापानी, रूसी, ऊर्दू जैसी भाषाऐं हैं जिनमें लिखे अनेक लेख इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं और जिनको बोलने वाले उनका उपयोग कम्प्यूटर पर भी करते हैं । इधर हम हैं, जो अपनी भाषा को भी अंग्रेज़ी में लिखते हैं । इससे न केवल हमारी भाषा, बल्कि हमारा अपना व्यक्तित्व मिट रहा है ।
आप चीन जैसे देश में जांए, तो यह पाएँगे की उन्हे अपनी भाषा पर गर्व है । उनके बच्चों को पढ़ाने का माध्यम भी चीनी भाषा ही है । इन्टरनेट पर भी वह चीनी का ही अधिक प्रयोग करते हैं । यही वजह है कि दुनिया की हर बढ़ी वेबसाइट और साफ़्टवेअर का एक चीनी रूप ज़रूर होता है । क्योंकि हम अपनी भाषा को अंग्रेज़ी के अक्षरों में लिकना पसंद करते हैं, इसलिए देवनागिरी का कम्प्युटर और इन्टरनेट पर बहुत कम महत्व है । क्योंकि हम हिन्दी का लिखित में उपयोग करना ही नहीं चाहते, कोई इनके उपयोग को ना सरल बनाता है और ना ही हमारी अपनी सरकार इसको बढ़ावा देती है । एक और कारण यह भी है कि चीन जैसे देशों में कम्प्यूटर चलाने वालों की संख्या सबसे अधिक है । पर यह सिर्फ़ इसी बात का परिणाम है की चीन की सरकार ने अपनी भाषा को महत्व दिया और देश की अधिक से अधिक जनता कम्प्यूटर चलाना आसानी से अपनी भाषा में ही सीख गई ।
आजसे मेरा प्रयास रहेगा की मैं इस ब्लाग पर कुछ न कुछ हिन्दी में ज़रूर लिखूँ ताकि मैं अपनी मातृ भाषा को सम्मान दे सकूँ ।
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